सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

मुझे बेहद अफ़सोस है, कि मै आज एक ऎसा अध्यापक हुँ जो एक अन्तराष्ट्रीय भाषा के प्रति बेहद कमजोर है। और शायद इस लिये और भी ज्यादा की मै अध्यापक हूँ। यदपि औरो कि नज़र मे मै अच्छा आटिस्ट हूँ और ये बात तर्कसंगत भी है की कला किसी भाषा की मोहताज नही है येही बात दिल को शकून पहुचाती है।

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